Sunday, 25 October 2009

ग़ज़ल आसमान

बूँद बनके गिरता है

और सैलाब बनके पसरता है

हाँ यही बारिश होती है,बारिश ऐसी ही होती है।

जेठ,बैशाख की दोपहरिया /आग उगलती चारों ओरे

तृष्णा और तपिश

झुलसते बदन, सुलगती होंठ और बेदम प्यास।

दरिन्दगी से मुक्ति पाने के लिए

बारिश की फरियाद की।

अप्रत्याशित जेठ की रात में

जब कुम्हलाये से सभी सोये थे

आसमान झरने लगा देरतक

गीली होती गई मन-तन की मिट्टी

शीतल बयार और बादलों के चोली में आसमान

जैसे झाऊ की झार झंकार हो।

राहत ऐसी की मत पूछो

सुबह पाया

आसमान का झरना

एक इरादा है।

उन लम्हों से दूर मैं

कभी सा रे गा माँ प् पर


लम्हें और गुलज़ार हुआ करते हैं


कभी वक्त सदमा पहुन्चाहता ,कभी इन्सान


हरकते-मुल्हा की करतूत


लम्हें अचानक मुसीबत बन जाती है।


वक़त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा।


कौन है जो गाता है


कबीर,रहीम और तुलसी को ,


कौन समझता है अब धरम-धारण की महत्ता?


गीता,रामायण,कुरान, बाइबल और ग्रंथसाहिब


बस, पढ़े जाते है तोता रटंत सा।


नीते फीते और पलीते


जब ज़रूरत तब जलाते। बस, एक तमाशा है


इंसानी खुराफातों का।


इरादे नेक हों और हौसले बुलंद


भटके गुज़रे लम्हे भी अपने हो जाते हैं।


राग जोगिया साबरी में टप्पे सा


गंधार गूंज संगीत शुद्ध और


आरोह अवरोह सा.

Saturday, 17 October 2009

शबरी-२

ॐ शिवे भगवे भगे भगे भगम , क्षोभय- क्षोभय, मोही -मोही , छादय-छादय , क्लेदय-क्लेदय क्लीन शरीरे ॐ फट स्वाहा।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीन सर्व्पुरुष सर्वस्त्री ह्रदय हारिणी माम्वाश्यम कुरु वशत ह्रीं श्रीं नमः।

ॐ चंडी महाचंडी दुरिताप हारिणी ,सर्व शत्रु विनाशिनी ,खिलनी मोहनी , स्ताम्भ्नी , उच्चातिनी , त्रैलोक्य स्वामिनी, माया मोहम बंधिनी, राजा- प्रजा वाशीकरनी , एं क्लीन ह्रीं हलोम स्वः ॐ फट स्वाहा। 21

Friday, 16 October 2009

शबरी

नमो अरिहंताणं , नमो सिद्धाणं, नमो आधियारानाम, नमो उवज्झायाणं , नमो लोय सव्वासहुनम। (७ बार)

ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रिंह कलिकुंद स्वामिने नमः , जय विजये अपराजिते चक्रेश्वरी ममार्थ सिद्ध सिद्ध , कुरु- कुरू स्वाहा। ( ५ बार)

ॐ नमो भगवते ह्रीं श्रीं पद्मावती मम कार्य कुरू-कुरू स्वाहा। (२१ बार)

ॐ ह्रीं श्रीं पर्श्वनाथय ह्रीं घरनेन्द्र पद्मावती सहिताई , अत्मचाक्शु, परम्चाक्शु, भुत्च्क्शु , डाकिनी चक्षु, सर्वलोक चक्षु , पितार्चाक्शु, आत्म काश-काश , हं- हं, दह-दह , पच -पच ,ॐ फट स्वाहा ( 5 )

नि दुर्ग इन्द्र श्न्थिह्या मित्रनाभी ये नो मर्तासो आम्न्ती।
आ रे तन शं सं क्रिनुही निन्त्सोरा नो भर स्न्भारानाम वसूनाम॥

माँ नो रक्षो अभिनाद्यातु मावातामापोच्छातु मिथुन या किमीदिना। पृथ्वी नह पार्थिवान पात्वं हसो अन्तिरिक्षम दिव्यात पत्वस्मान॥
इन्द्र जाही पुमांस यातुधान्मुत स्त्र्यम मायया शाश्दा नाम।
विग्रिवासो मूर्देवा रिदन्तु माँ ते द्रिष्ण त्सूर्य मुच्च्रानतम॥

मनसः काम माकूतिम वाचः सत्यम शीम्ही।
पशूनां रूपा मानस्य मई श्री श्रयतां यशः॥

त्वया वयुत्तामम धीमहे वयो बृहस्पते पप्रिना सासनी ना युजा।
या नो दुह्संसो अभिदिप्त्सुरीशत प्र सुशंषा मति भिस्ताराशी माहि॥


ॐ नमो श्री पर्स्वनारायाय चिपटी नाम महाविद्याय , सर्व ज्वर, विनाशानिया, या दिशं पश्यामि, टा टा भवति निह्ज्वर, शिरो मुन्छा मुन्छा , ललाट मुन्च्च -मुन्छा , नेत्र मुन्छा-मुन्छा , नासिका मुन्छा-मुन्छा, क्रोधोमुन्छा-मुन्छा, कटी मुन्छा-मुन्छा , पदों मुन्छा-मुन्छा,गति मुन्छा-मुन्छा,भूमिया मुन्छा-मुन्छा,भूमिया गाछा महान ज्वर स्वाहा।

ॐ शिवे भगवे भगे भगे भगम , क्षोभय- क्षोभय, मोही -मोही , छादय-छादय , क्लेदय-क्लेदय क्लीन शरीरे ॐ फट स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीन सर्व्पुरुष सर्वस्त्री ह्रदय हारिणी माम्वाश्यम कुरु वशत ह्रीं श्रीं नमः।
ॐ चंडी महाचंडी दुरिताप हारिणी ,सर्व शत्रु विनाशिनी ,खिलनी मोहनी , स्ताम्भ्नी , उच्चातिनी , त्रैलोक्य स्वामिनी, माया मोहम बंधिनी, राजा- प्रजा वाशीकरनी , एं क्लीन ह्रीं हलोम स्वः ॐ फट स्वाहा। 21

शबरी मंत्र

(1) नि दुर्ग श्न्थी ह्या मित्रनाभी ये नो मर्तासो अम्न्ति।
आरे तं शम सम क्रिनुही निनित्सोरा नो भर सम्भारानाम वसूनाम।
(२)अयं सोम इन्द्र तुभ्यम सुम्ब आ तू प्र याही हरिवास्त्दोकः।
पिबा त्वास्य सुशुतस्य चरोर्दादो मघनी मधाव्न्नियानाह।