Friday, 16 October 2009

शबरी मंत्र

(1) नि दुर्ग श्न्थी ह्या मित्रनाभी ये नो मर्तासो अम्न्ति।
आरे तं शम सम क्रिनुही निनित्सोरा नो भर सम्भारानाम वसूनाम।
(२)अयं सोम इन्द्र तुभ्यम सुम्ब आ तू प्र याही हरिवास्त्दोकः।
पिबा त्वास्य सुशुतस्य चरोर्दादो मघनी मधाव्न्नियानाह।

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