Sunday, 25 October 2009

उन लम्हों से दूर मैं

कभी सा रे गा माँ प् पर


लम्हें और गुलज़ार हुआ करते हैं


कभी वक्त सदमा पहुन्चाहता ,कभी इन्सान


हरकते-मुल्हा की करतूत


लम्हें अचानक मुसीबत बन जाती है।


वक़त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा।


कौन है जो गाता है


कबीर,रहीम और तुलसी को ,


कौन समझता है अब धरम-धारण की महत्ता?


गीता,रामायण,कुरान, बाइबल और ग्रंथसाहिब


बस, पढ़े जाते है तोता रटंत सा।


नीते फीते और पलीते


जब ज़रूरत तब जलाते। बस, एक तमाशा है


इंसानी खुराफातों का।


इरादे नेक हों और हौसले बुलंद


भटके गुज़रे लम्हे भी अपने हो जाते हैं।


राग जोगिया साबरी में टप्पे सा


गंधार गूंज संगीत शुद्ध और


आरोह अवरोह सा.

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