Sunday, 25 October 2009

ग़ज़ल आसमान

बूँद बनके गिरता है

और सैलाब बनके पसरता है

हाँ यही बारिश होती है,बारिश ऐसी ही होती है।

जेठ,बैशाख की दोपहरिया /आग उगलती चारों ओरे

तृष्णा और तपिश

झुलसते बदन, सुलगती होंठ और बेदम प्यास।

दरिन्दगी से मुक्ति पाने के लिए

बारिश की फरियाद की।

अप्रत्याशित जेठ की रात में

जब कुम्हलाये से सभी सोये थे

आसमान झरने लगा देरतक

गीली होती गई मन-तन की मिट्टी

शीतल बयार और बादलों के चोली में आसमान

जैसे झाऊ की झार झंकार हो।

राहत ऐसी की मत पूछो

सुबह पाया

आसमान का झरना

एक इरादा है।

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